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मानक हिंदी : सवाल और सुझाव
Thread poster: Suyash Suprabh

Suyash Suprabh  Identity Verified
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Jul 7, 2008

मानक हिंदी से संबंधित ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनके उत्तर किसी पुस्तक में नहीं मिल सकते हैं। भाषा गतिशील होती है और बदलती सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों के साथ भाषा का स्वरूप भी बदलता रहता है। अनुवादकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे भाषा के मानक रूप का प्रयोग करें, मगर ऐसा करना हमेशा आसान नहीं होता है। दिक्कत तो तब आती है जब एक शब्द के अनेक रूप प्रचलित होते हैं और हमारे लिए उस शब्द का "मानक" रूप चुनना लगभग असंभव हो जाता है। कई बार व्याकरण और विरामादि चिह्नों के प्रयोग को लेकर भी मतैक्य नहीं हो पाता है।

मानक हिंदी से संबंधित अपनी शंकाओं के बारे में खुलकर बात करते हुए हम न केवल अपनी भाषा सुधारेंगे, बल्कि इससे हम हिंदी के विकास में अपना योगदान भी कर सकेंगें।

अब मैं प्रश्नों का श्रीगणेश करता हूँ:

क्या पूर्ण विराम के बदले अंग्रेज़ी के फुल स्टॉप का प्रयोग करना सही है?

मुझे फुल स्टॉप का प्रयोग सही नहीं लगता है। मैंने इस विषय पर अन्य साथियों से भी चर्चा की है। हरिराम जी के विचार यहाँ विशेष रूप से प्रासंगिक हैं:

"अखबारों (बीबीसी, टाइम्स ग्रुप , सरिता-मुक्ता ग्रुप आदि) में पूर्णविराम
की जगह Fullstop का प्रयोग सिर्फ सुविधा और शीघ्रता की दृष्टि से किया
जाता है। क्योंकि कीबोर्ड लेआऊट में fullstop सामान्य की से टाइप हो जाता
है, किन्तु पूर्णविराम के लिए शिफ्ट की दबाए रखकर टाइप करना पड़ता है
(inscript में)। जिससे अतिरिक्त भार पड़ता है और कुछ मिलिसेकेण्ड की टंकण
गति कम होती है।

किन्तु Advanced कम्प्यूटिंग यथा NLP के प्रयोगों में यह गलत है और
अनेकानेक भयंकर समस्याओं को जन्म देता है---

यथा--

एक वाक्य का उदाहरण लें-

"Mr. A.B.Strong has paid a sum of Rs.5,678.50 by online payment
through hdfcbank.com."

यहाँ dot (.) का प्रयोग अनेक अर्थों में हुआ है

"Mr. A. (abbreviation) B. (abbreviation) Strong has paid a sum of Rs.
(abbreviation) 5,678.(Decimal point)50 by online payment through
hdfcbank.(dot)com. (full stop)"

इससे शब्दबोध में काफी परेशानी होती है। और CAT(Computer Aided
Translation) हेतु वाक्यखण्ड बनाने के दौरान गलत स्थान पर वाक्य विच्छेद हो
जाता है।

अंग्रेजी के फुलस्टॉप (.) period का प्रयोग अनेक अर्थों में होता है
(1) Fullstop या वाक्यान्त(U002E)
(2) संक्षिप्ति चिह्न abbreviation
(3) .(DOT) वेबसाइट पतों तथा ईमेल मे विशेष पहचान हेतु
(4) Math में multiply के लिए ( 2.2=4)
(5) Rs.1234.50 Decimal point के रूप में
(6) paragraph end के लिए
अन्य प्रयोग और भी हैं.... यथा dotted line के लिए......

अतः पूर्णविराम के स्थान पर फुलस्टॉप का प्रयोग करना सर्वथा गलत है...
-- अनजाने में भयंकर समस्या पैदा करना है
-- तकनीकी रूप से अवैज्ञानिक है।

इसके विपरीत हिन्दी (देवनागरी) यूनीकोड में

(1) वाक्य-अन्त हेतु पूर्णविराम/दण्ड (। - U0964) निर्धारित है।"

मैं इस विषय पर आपकी राय जानना चाहता हूँ।

मानक हिंदी से संबंधित आपके प्रश्नों का भी स्वागत है।












[2008-07-07 11:26 पर संपादन हुआ]


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आनंद  Identity Verified
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Jul 16, 2008

सरिता-मुक्‍ता ग्रुप ने बिंदु का प्रयोग बहुत पहले से प्रारंभ कर दिया था । मुझे याद आता है कि वह अपने तर्क का उल्‍लेख लगभग हर अंक में एक बॉक्‍स में कहते थे, जैसे, बिंदु से स्‍याही कम खर्च होती है, कागज में कम स्‍थान घेरता है और यह सुंदर भी दिखाई देता है। इसके साथ दो व्‍यक्तियों का कार्टून भी होता था, एक व्‍यक्ति खड़ी पाई (।) तलवार की तरह हाथ में लिए खड़ा रहता था और दूसरा व्‍यक्ति ढाल की तरह गोलाकार चिह्न। उस समय Inscript की शुरूआत भी नहीं हुई थी।

आपकी बातें बिलकुल सही हैं। कई अलग-अलग संदर्भों में एक ही चिह्न Fullstop का प्रयोग करना नितांत अवैज्ञानिक है। परंतु इससे हिंदी जितनी प्रभावित होगी, उससे अधिक अंग्रेज़ी प्रभावित हो रही है। इसलिए यह समस्‍या हिंदी के बजाए अंग्रेज़ी भाषा की है। हिंदी इस मामले में अधिक समृद्ध है कि इसके पास खड़ी पाई (।) मौजूद है।

बल्कि अंग्रेज़ी भाषाविदों के लिए एक सुझाव है, कि वे अपने वाक्‍यांत में प्रयोग के लिए कोई नया चिह्न तलाशें!

आनंद

पुनश्‍च : यह NLP क्‍या होता है ?

[Edited at 2008-07-16 02:48]


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Suyash Suprabh  Identity Verified
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फुल स्टॉप का प्रयोग सही नहीं है Jul 18, 2008

आपने पूर्ण विराम के संदर्भ में सरिता-मुक्ता ग्रुप का बहुत अच्छा उदाहरण दिया है। मीडिया की ऐसी हर गतिविधि की आलोचना होनी चाहिए जिससे हिंदी का विकास बाधित होता है। अंग्रेज़ी के फुल स्टॉप का प्रयोग पूरी तरह अवैज्ञानिक है।

हरिराम जी ने NLP का प्रयोग Natural Language Processing के लिए किया है।


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Suyash Suprabh  Identity Verified
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मानक हिंदी वर्तनी Jan 12, 2009

इंटरनेट पर मानक हिंदी वर्तनी से संबंधित निम्नलिखित नियम उपलब्ध हैं (http://www.giitaayan.com/hindispelling.asp):

1. The case-signs in Hindi should always be written as separate words, except in case of pronouns where they should be tagged on to the stems (प्रतिपादिक); e.g. १. राम ने २. स्त्री को ३. उसने ४. मुझको.
Exception:
1. Where pronouns have two case-signs at a time, the first should be tagged on to the stem while the second should be written separately; e.g. १. उसके लिये २. इसमें से.
2. When the particles ही, तक etc. fall in between a pronoun and its case-sign be written as a separate word; e.g. आप ही के लिये, मुझ तक को.
2. In case of compound verbs, all subsidiaries should be written separately; e.g. १. पड़ा करता है २. आ सकता है.
3. The indeclinables तक, साथ etc. should always be written as separate words; e.g. आपके साथ, यहाँ तक.
4. The absolutive forms should always be written as single words; e.g. मिलाकर, खा-पीकर, रो-रोकर.
5. In case of co-ordinative compounds, hyphen should be placed in between the constituent words; e.g. राम-लक्ष्मण, शिव-पार्वती-संवाद.
6. Hyphen should be placed before particles like सा, जैसा; e.g. तुम-सा, राम-जैसा, चाकू-से तीखे.
7. In case of dependent determinative compounds, hyphen should be used only to avoid risk of ambiguity; e.g. भू-तत्व.
8. Where the use of glidal य, व is optional, it may be avoided, i.e., in the words like गए-गये, नई-नयी, हुआ-हुवा, etc. using only the former (vowel) forms. This rule is applicable in all cases viz., verbal, adjectival and undeclinable forms.
9. ऐ and औ express two distinct sounds in Hindi. First as in words like है, और, etc. and the other in words like गवैया, कौवा, etc. The use of these symbols to express these two distinct sounds should continue. Modifications like गवय्या, कव्वा, etc. are unnecessary.
10. तत्सम words borrowed from Sanskrit should ordinarily be spelt in their original Sanskrit form. But where the use of Hal sign (right slanting stroke \) has already discontinued in Hindi, words like महान (न्‌), विद्वान (न्‌), it need not be revived.
11. Where the fifth letter of a class of consonants (वर्ग) precedes any of the four remaining letters of the same class, the अनुस्वार should be invariably used instead of the fifth letter; e.g. अंत, गंगा, संपादक.
12. Use of nasalisation sign (अँ) (चंद्रबिंदु) is sometimes necessary to avoid ambiguity in meaning and to mark out distinction between words like हंस-हँस etc. Except where it is difficult to write or print, चंद्रबिंदु must necessarily be used in poetry to maintain metric sequence. Similarly, in the primers for children where introduction of चंद्रबिंदु is desired, चंद्रबिंदु must invariably be used; e.g. नहीँ, मेँ, मैँ, etc.
13. Words of Arabo-Persian origin which have been adapted in Hindi vocabulary should continue to be used as such; e.g. जरूर. But where their use in innate form is desired, dots (नुक़्ते) must be used to denote alien origin; e.g. राज़, नाज़.
14. Where use of English words with half-open औ sound is desired, अर्ध-चंद्र symbol should be placed over आ as in ऑनरेरी, डॉक्टर.
15. If Sanskrit words with विसर्ग have to be used in Hindi in their तत्सम form, the विसर्ग should be placed appropriately as in दुःखानुभूति. But if such words are to be used in their modified (तद्भव) form, विसर्ग can easily be omitted as in दुख-सुख के साथी.

उपर्युक्त नियमों को लेकर हिंदी के विद्वानों और लेखकों में मतैक्य नहीं है। हालाँकि, इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हिंदी वर्तनी की अनेकरूपता के संदर्भ में ये नियम महत्त्वपूर्ण हैं।

इन नियमों के पालन में अनेक बाधाएँ हैं। हिंदी के शिक्षक इन नियमों को पर्याप्त महत्त्व नहीं देते हैं। मेरे हिंदी शिक्षक ग्यारहवें नियम को गलत मानते थे और मैं भी कुछ वर्षों पहले तक उनकी शिक्षा को "सर्वोपरि" मानते हुए इस नियम का पालन नहीं करता था। आज मैं एक अनुवादक के तौर पर इस नियम का महत्त्व जानता हूँ।

चंद्रबिंदु के प्रयोग को लेकर भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हिंदी के अनेक अनुवादक इसके प्रयोग को सही मानते हैं। इस विषय पर उनकी राय जानने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें:

http://groups.google.co.in/group/hindianuvaadak/browse_thread/thread/7197f53af17e15c9

क्या आप उपर्युक्त पंद्रह नियमों को सही मानते हैं? अत्यधिक व्यस्त होने की स्थिति में आप केवल एक शब्द "सहमत" या "असहमत" लिखकर अपनी राय दे सकते हैं।


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Mrudula Tambe  Identity Verified
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अनुस्वार एवं नुक्त Feb 3, 2009

सभी हिन्दी भाषातज्ज्ञ एवं अभ्यासकों को मेरा हार्दिक प्रणाम ,

मैं भी गत ३ साल से हिन्दी का गंभीरता से अभ्यास कर रही हुँ जिससे मैं परम आनंददायी हिन्दी साहित्य का आनंद प्राप्त कर पाऊँ ।

परन्तु मेरा निरिक्षण यह है के हिन्दी का लेखन करते समय ँ का तथा नुक्त का प्रयोग अलग अलग ढंग से किया जाता है । इस कारण मन में दुविधा उत्पन्न हो जाती है । उदाहरण के तौर पर
http://www.shabdkosh.com/en2hi/search.php?e=date&f=0 इस कड़ी पर एक ही शब्द "तारीख" और "तारीख़" ऐसे दो रुप में लिखा गया हैं । वैसे ही "हुं" और "हुँ" इन दोनो का उपयोग हिन्दी लेखन मे होता हैं ।

कृपया आप में कोई एक, इस विषय में अधिक जानकारी दे तो यह मेरा सौभाग्य होगा ।

आपकी विनिता,
मृदुला ।


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Balasubramaniam L.  Identity Verified
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Mar 15, 2009

Suyash Suprabh wrote:

मानक हिंदी से संबंधित ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनके उत्तर किसी पुस्तक में नहीं मिल सकते हैं।


प्रिय सुयश जी,

लगता है आपने किशोरीदास वाजेपयी का नाम नहीं सुना है, वरना उपर्युक्त वाक्य न कहते।

वाजपेयजी ने 60-70 के दशक में और उससे पहले भी हिंदी के मानक व्याकरण को स्थिर करने के लिए भगीरथ प्रयत्न किया था। वे इतने प्रतिभाशाली वैयाकरण थे कि राहुलसांस्कृत्यायन ने उन्हें हिंदी का पाणिनी घोषित किया था।

वाजपेयजी ने व्याकरण के अनेक ग्रंथ रचे हैं जो हिंदी व्याकरण, वर्तनी, शब्दार्थ आदि के हर पहलू पर प्रकाश डालते हैं। यदि कोई इन ग्रंथों का अध्ययन करे, तो उसे हिंदी व्याकरण, वर्तनी आदि से जुड़ी हर समस्या का सहज ही समाधान मिल जाएगा

उनके प्रमुख ग्रंथ निम्नलिखित हैं:-

1. हिंदी शब्दानुशासन

यह उनकी प्रमुख रचना है। इसे उनसे नागरी प्रचारिणी सभा ने लिखवाया था। कामताप्रसाद गुरु के "हिंदी व्याकरण" के बाद यह हिंदी का महत्वपूर्ण व्याकरण ग्रंथ है। असल में ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कामताप्रसाद गुरु का हिंदी व्याकरण परंपरागत शैली में लिखा बृहद एवं सर्वांगीण व्याकरण है जिसमें हिंदी भाषा के हर पहलू पर चर्चा हुई है, जबकि हिंदी शब्दानुशासन अधिक प्रौढ़ रचना है, जो व्याकरण की कुछ गूढ़ विषयों पर आश्चर्यजनक गहराई से विचार करता है। इसमें वाजपेयी जी ने कामताप्रसाद गुरु के व्याकरण की गलतियों पर बड़े ही मजेदार कटाक्ष किए हैं, जिससे इस पढ़ने में अलग आनंद आता है।

2. अच्छी हिंदी का नमूना

1930-40 के आसपास रामकुमार वर्मा ने एक पुस्तक लिखी थी, जिसका नाम था, "अच्छी हिंदी"। रामकुमार वर्मा ने हिंदी शब्दसागर के निर्माण में पंडित रामचंद्र शुल्क और श्यामसुंदर दास के साथ काम किया था, इसलिए कोश रचना के बारे में उनको जानकारी थी। इसलिए उनसे लोगों ने कहा था कि हिंदी की अशुद्धियों को लेकर एक पुस्तक लिखें, जिसमें अच्छी हिंदी का नमूना हो। इसी सलाह का नतीजा यह पुस्तक था।

लेकिन रामकुमार अच्छे कोशकार शायद थे, पर अच्छी हिंदी के पारखी बिलकुल नहीं थे। उनकी अच्छी हिंदी किताब में ही भद्दी हिंदी के अनेक नमूने थे। लेकिन दुर्भाग्य से यह पुस्तक प्रसिद्धि पा गई थी और अनेक स्कूलों कालेजों में लग गई थी, जिससे उससे और भी अधिक नुकसान हो रहा था। किसी विद्नान को इस अनर्थ को रोकने के लिए आगे आना था, और कोशोरीदास वाजपेयी ने यह बीड़ा उठाया। उन्होंने उपर्युक्त पुस्तक रचकर, अच्छी हिंदी के एक-एक भद्दे उदाहरण को लेकर पाठकों को समझाया ये अच्छी हिंदी की दृष्टि से क्यों गलत है।

हिंदी के हर विद्यार्थी को यह किताब पढ़नी है।

3. हिंदी शब्द मिमांसा

हिंदी में दुहरे रूप बहुत चल रहे थे, यथा - ई-यी, ए-ये वाले रूप (दिए, दिये, पाई, पायी, इत्यादि)। कुछ अन्य प्रश्न भी थे, जैसे पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग, चंद्रबिंदु के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग, कुछ हिंदी शब्दों के अंत में हल चिह्न का प्रयोग, कानून, जमीन, अंदाज, कसूर आदि शब्दों में नुक्ता लगाना चाहिए या नहीं, इत्यादि, इत्यादि। इन सबके बारे में विशद विवेचन करके वाजपेयी जी ने सही क्या है गलत क्या है इसका क्षीर-नीर विवेचन किया है। यदि कोई केवल इस एक किताब का अध्ययन करे, तो हिंदी की 99 फीसदी वर्तनी दोष दूर हो जाएंगे।

4. अच्छी हिंदी

5. हिंदी निघंटू

6. भारतीय भाषा विज्ञान
7. हिंदी कीवर्तनी तथा शब्द विश्लेषण



सौभाग्य से अभी हाल में वाणी प्रकाशन ने वाजपेयी जी की सभी रचनाओं का वांड्मय प्रकाशित किया है, जिसमें उपर्युक्त सभी किताबें शामिल हैं। वाणी प्रकाशन से इनमें से प्रतेयक किताब अलग से भी उपलब्ध है।

मेरी सलाह है कि जो भी हिंदी अनुवाद, पत्रिकारिता, लेखना आदि में गंभीर काम कर रहे हों, उन्हें वाजपेयी की सभी किताबें प्राप्त करनी चाहिए और उनका गहन अध्ययन करना चाहिए।

वाणी प्रकाशन का पता यह है:
वाणी प्रकाशन, 21,ए दरियागंज, नई दिल्ली-110002


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Balasubramaniam L.  Identity Verified
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पूर्ण विराम बनाम फुल स्टोप Mar 15, 2009

पूर्ण विराम के पक्ष में जो असली तर्क हैं, वे आपकी नजर से छूट गए हैं। लिनक्स के हिंदी रूपांतरण के लिए बनी डाक सूची में भी इसको लेकर हाल में बहस छिड़ी थी। वहां मैंने खड़ी पाई के पक्ष को विस्तार से समझाया था, वहां से यह उद्धरण आपकी जानकारी के लिए दे रहा हूं। मूल बहस को हिंदी डाक सूची भी पढ़ें, उसका पता नीचे दिया गया है।

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विराम चिह्न के लिए फुल स्टोप के प्रयोग को लेकर मेरी आपसे असहमति है। यह देवनागरी लिपि की एस्थेटिक्स से छेड़-छाड़ करने के बराबर है। यदि आप देवनागरी लिपि में लिखे पाठ को देखें, तो आप पाएंगे, उसमें सर्वत्र खड़ी पाई का ही बोलबाला है। लगभग हर वर्ण में खड़ी पाई या तो पूर्ण रूप से विद्यमान है अथवा आंशिक रूप से। विद्वानों का यहां तक मत है कि हिंदी का एक नाम खड़ी बोली इसलिए है क्योंकि इसमें खड़ी पाई सभी जगह पाई जाती है। इसलिए खड़ी पाई देवनागरी लिपि की प्रकृति के अनुकूल है। इसे ही विराम चिह्न के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए।

खड़ी पाई के पक्ष में एक अन्य बात भी है। केवल यही एक हिंदी का अपना विराम चिह्न है, बाकी सब अंग्रेजी के हैं। तब फिर उसे क्यों छोड़ा जाए।

एक अन्य वजनदार तर्क भी है, खड़ी पाई के पक्ष में। हिंदी में बिंदी का बहुत अधिक उपयोग होता है - नुक्ता के रूप में, बहुवचन सूचित करने के लिए, दशमलव चिह्न के रूप में, और ङ जैसे कुछ अक्षरों में तो वह पहले से ही विद्यमान है। इस तरह हिंदी में बिंदी शब्द के आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, सभी जगह लगाई जाती है। अब विराम चिह्न के लिए भी उसका उपयोग करने से भारी गड़बड़ी फैल जाएगी।

दूसरी बात कंप्यूटर स्क्रीन पर उसके ठीक से दिखने से संबंधित है। बहुत कम पिक्सेल साइसों में बिंदी ठीक से नहीं दिखाई देती है अथवा उसके आजू-बाजू के पिक्सलों में वह विलीन हो जाती है। इसलिए बहुत छोटे टाइप साइसों में 'हिंदी', 'पढ़', आदि की बिंदी दिखाई ही नहीं देती। यदि हम विराम चिह्न के लिए भी बिंदी का प्रयोग करने लगें, तो बहुत छोटे टाइपसाइसों में यह पता ही नहीं चल पाएगा कि वाक्य कहां समाप्त हो रहा है।

इसलिए हमें चाहिए कि हम लोगों को समझाएं कि हिंदी में विराम चिह्न के लिए खड़ी पाई ही क्यों उपयुक्त है, और उसे ही अपनाना चाहिए।
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लिनक्स प्रचालन तंत्र का हिंदीकरण कुछ स्वयंसेवियों द्वारा किया जा रहा है। आपमें से जिन्हें इस कार्य में योगदान देने की इच्छा है, वे इस डाक सूची को पढ़ें और वहां अपनी पंजीकरण कराएं:-

indlinux-hindi@lists.sourceforge.net

यही बहस इंटरनेट में एक अन्य जगह भी चल रही हैं। आपको उसमें भी रुचि हो सकती है:-

deewan@sarai.net


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Balasubramaniam L.  Identity Verified
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प्रोज.कोम में मेरा लेख भी पढ़ें Mar 15, 2009

बहुत समय पहले हिंदी वर्तनी पर मैंने प्रोज.कोम में एक लेख लिखा था, जिसमें इन सब विषयों पर मैंने विस्तृत चर्चा की है। मुख्य रूप से इस लेख में मैंने किशोरीदास वाजपेयी के विचारों को ही दुहराया है। यह लेख भी आपके लिए प्रासंगित हो सकती है। उसकी कड़ी यह है:-

http://www.proz.com/translation-articles/articles/705/


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Balasubramaniam L.  Identity Verified
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खूब कहा! Mar 15, 2009

dubsur wrote:

...अंग्रेज़ी भाषाविदों के लिए एक सुझाव है, कि वे अपने वाक्‍यांत में प्रयोग के लिए कोई नया चिह्न तलाशें!



दसबर जी, मैं आपके इस सलाह से बिलकुल सहमत हूं!!!


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Balasubramaniam L.  Identity Verified
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और डा. रामविलास शर्मा को भी न भूलें Mar 15, 2009

हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य, हिंदी जाति, हिंदी साहित्यकार, आदि के बारे में सबसे प्रखर विचारक डा.रामविलास शर्मा हैं। अपने लगभग 90 वर्ष के जीवनकाल का एक-एक पल इस महान हिंदी सेवी ने हिंदी को एक-से-बढ़कर-एक ग्रंथ देने में बिताया। आपने 100 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमे से कुछ का संबंध हिंदी भाषा और भाषा विज्ञान के बारे में हैं।

इन किताबों को हर हिंदी पेशवर को पढ़ना चाहिए। मैं कुछ प्रमुख रचनाओं की सूची यहां देता हूं -

1. भारत की भाषा समस्या
इसमें डा.शर्मा ने हिंदी की अनेक समस्याओं पर चर्चा की है, जिसमें वर्तनी, एकरूपता आदि की समस्या भी है। हिंदी और उर्दू की समस्या पर भी विशद चर्चा है। उन्होंने बड़ी मेहनत से समझाया है कि अंग्रोजों ने हिंदू और मुसलमानों में वैमनस्य बढ़ाने के लिए फोर्ट विलियम कोलेज ओफ लिंग्विस्टिक्स स्थापित करके गिलक्राइस्ट आदि के माध्यम से हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएं सिद्ध करने का एक महान षड्यंत्र रचा था, जिसका अंतिम परिणाम देश के विभाजन में हुआ।

2. भाषा और समाज
यह डा.शर्मा की एक महत्वपूर्ण कृति है, जिसमें उन्होंने परंपरागत भाषावैज्ञानियों द्वारा फैलाई गई अनेक भ्रांत धारणओं का निराकरण करते हुए अपने मौलिक विचार प्रकट किए हैं। क्या आर्य बाहर से भारत आए थे, क्या आर्यों ने ड्रविडों को जीता था, क्या ऋग्वेद भारत के बाहर रचा गया था, क्या संस्कृत, जर्मन, रूसी, लैटिन आदि बहनें हैं, क्या हिंदी, मराठी, बंगाली आदि सस्कृत की पुत्रियां हैं, इस तरह के सवालों के उनके जवाब बड़े ही रोचक हैं।

3. भारत केप्राचीन भा-परिवार और हिंदी (तीन भाग)
यह डा. शर्मा की मैग्नम ओपस है। इसमें उन्होंने भारत के सभी प्रमुख भाषा-परिवारों का भाषावैज्ञानकि विवेचन करके उनमें हिंदी का स्थान स्पष्ट किया है।

इन किताबों को पढ़ने से पाठक को हिंदी भाषा के असली स्वरूप का बहुत अच्छा एहसास होता है। उनकी लेखन शैली इतनी प्रांजल और प्रभावशाली है कि उसे पढ़कर भी हमारी भाषा का परिष्कार होता है।

डा. रामविलास शर्मा की लगभग सभी किताबें राजकमल प्रकाशन और वाणी प्रकाशन से निकली है। वाणी प्रकाशन का पता मैंने ऊपर एक अन्य पोस्ट में दिया है। राजकमल प्रकाशन का पता यह है:-

राजकमल प्रकाशन
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली 110002

इसलिए ऐसी बात नहीं है कि हिंदी में ऐसी पुस्तकें नहीं हैं, जिनमें वर्तनी, व्याकरण आदी की विशद चर्चा नहीं हुई है। बात यह लगती है कि हिंदी के तथाकथित पेशेवर इतने आलसी है कि उपलब्ध किताबों को पढ़कर अपना ज्ञानवर्धन करें।

सुयशजी, आप इन आसलियों की श्रेणी में न आएं, और वाजपेयजी और शर्मा जी की ऊपर बताई किताबों को अवश्य पढ़ें।


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Lalit Sati  Identity Verified
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आचार्य किशोरी दास वाजपेयी Mar 15, 2009

बालसुब्रमण्यम जी, हिंदी जगत के इस महान व्यक्तित्व का वर्तमान संदर्भ में उल्लेख करने के लिए आपका धन्यवाद!

निश्चित ही हम सभी को आचार्य किशोरी दास वाजपेयी के साहित्य से परिचित होना चाहिए। मेरी समझ से "हिंदी शब्दानुशासन" को प्राथमिकता देना अधिक उपयुक्त रहेगा।

ललित
15-03-2009, अपराह्न 3.18 बजे


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Suyash Suprabh  Identity Verified
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उपयोगी जानकारी के लिए धन्यवाद Mar 15, 2009

बाला जी, मैंने किशोरीदास वाजपेयी की पुस्तक पढ़ी है, लेकिन इसमें मुझे मानक हिंदी से संबंधित अनेक प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल पाए। यह पुस्तक आज से लगभग 50 वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी। वैश्वीकरण के इस युग में हर भाषा तेज़ी से बदल रही है। आधुनिक हिंदी के प्रयोग पर विचार-विमर्श के लिए इस पुस्तक में दी गई जानकारी पर्याप्त नहीं है। इस पुस्तक में वर्तनी से संबंधित जानकारी तो मिलती है, लेकिन आधुनिक हिंदी के प्रयोगों पर चर्चा करने के लिए हमें नवीनतम पुस्तकों का अध्ययन करना होगा।

आपने अपने आलेख में हिंदी वर्तनी से संबंधित बहुत उपयोगी जानकारी दी है।

आजकल हिंदी में 'योग' को 'योगा' भी कहा जाता है! अंग्रेज़ी के शब्दों का हिंदी में अनावश्यक प्रयोग हो रहा है। वाक्य संरचना पर अंग्रेज़ी का बहुत अधिक प्रभाव है। आजकल सहज हिंदी 'दुर्लभ' होती जा रही है। आज की हिंदी का एक उदाहरण देखें:

"आर.के. पुरम स्टूडंट मर्डर केस सॉल्व"

किशोरीदास वाजपेयी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कभी ऐसी हिंदी भी पढ़ने को मिलेगी! इस 'उत्तर-आधुनिक' हिंदी के कुछ और उदाहरण यहाँ उपलब्ध हैं:

http://anuvaadkiduniya.blogspot.com/2009/03/2.html

खड़ी पाई के संदर्भ में आपने बहुत उपयोगी जानकारी दी है।

किशोरीदास वाजपेयी और रामविलास शर्मा जैसे विद्वानों की पुस्तकों का अध्ययन ऐसे हर व्यक्ति को करना चाहिए जो हिंदी के प्रयोग, व्याकरण आदि से संबंधित जानकारी प्राप्त करना चाहता है। मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि अन्य अनुवादकों ने इन पुस्तकों का अध्ययन किया है या नहीं।

आपके उत्तर से इस 'मृतप्राय' पोस्ट को नया जीवन मिला। मानक हिंदी से संबंधित ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनपर विचार-विमर्श करना आवश्यक है। मैं आशा करता हूँ कि अन्य अनुवादक भी इस संदर्भ में हमें अपने विचारों से अवगत कराएँगे।


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Mrudula Tambe  Identity Verified
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सच है, Mar 16, 2009

अंग्रेज़ी के शब्दों का हिंदी में अनावश्यक प्रयोग हो रहा है।

मराठी और हिंदी भाषा भगिनी होने के नाते मैं कह सकती हुँ की इन दिनों इन भाषाओं के उपयोग में अंग्रेजी का दुष्प्रभाव न केवल शब्दों तक सीमित है अपि तु वाक्यरचनाओं पर भी इसका असर दिख रहा है जैसे की आज तक हम धन्यवाद देते आएँ है लेकिन हाल ही में हिंदी / मराठी धारावाहिकों में लोग धन्यवाद करते हैं जों की thank you का सीधा भाषांतर है न की अनुवाद ।

[Edited at 2009-03-16 02:48 GMT]


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आनंद  Identity Verified
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झकझोर कर जगाने के लिए धन्‍यवाद Mar 20, 2009

बाला जी,


आपके पोस्‍ट ने मुझे आत्‍मअवलोकन करने पर मज़बूर कर दिया। आपका कहना बिलकुल सही है। दरअसल, हम अपनी समस्‍या समाधान के लिए इधर-उधर हाथ पैर मारते हैं, तात्‍कालिक समाधान हो जाने के बाद ठंडे पड़ जाते हैं। इन दिनों चल रही चर्चाओं ने मानक हिंदी के बारे में जिज्ञासा तो बढ़ाई थी, परंतु सही मार्गदर्शन का अभाव था। किस मानक माना जाए?

पहले ही मानक स्‍वरूप पर इतना अधिक काम हो चुका है। इस बारे में आपकी पोस्‍ट निस्‍संदेह ज्ञानवर्धक है। अब यथाशीघ्र इन पुस्‍तकों को पढा जाए। आपके आलेख ने सोते से झकझोर कर उठाया। आपके पोस्‍ट में न केवल पुस्‍तकों की जानकारी है बल्कि उसमें शामिल आत्‍मीय "डाँट" ने यह आश्‍वस्‍त किया है कि किसी भी समस्‍या पर आपका मार्गदर्शन उपलब्‍ध रहेगा।

आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद ।

- आनंद


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Suyash Suprabh  Identity Verified
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स्टॉप, स्टाप और स्टोप Mar 29, 2009

सन् 2003 में भारत सरकार द्वारा गठित समिति ने इस संदर्भ में निम्नलिखित नियम प्रस्तुत किया था:

"अंग्रेज़ी के जिन शब्दों में अर्धविवृत 'ओ' ध्वनि का प्रयोग होता है, उनके शुद्ध रूप का हिंदी में प्रयोग अभीष्ट होने पर 'आ' की मात्रा के ऊपर अर्धचंद्र का प्रयोग किया जाए (ऑ)।"

प्रयोजनमूलक हिंदी पर लिखी गई एक पुस्तक में इस विषय पर यह विचार प्रस्तुत किया गया है:

"मानक हिंदी ने अपनी उदार-लचीली एवं समन्वयमूलक प्रवृत्ति के कारण अपनी अभिव्यंजना-क्षमता और संप्रेषण-क्षमता को अधिकाधिक वास्तविकता, यथार्थता प्रदान करने के लिए अन्य भाषाओं की कतिपय स्वर-ध्वनियों को भी अपने ध्वनि-परिवार में सम्मिलित कर लिया है। बंगला के 'ओ' तथा अंग्रेज़ी के 'ऑ' ('अ' और 'ओ' का मध्यवर्ती स्वर) इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ('आ' स्वर का अर्ध 'ओ' जैसा उच्चारण) यथा — डॉक्टर, बॉक्स, ऑपरेशन आदि में उच्चरित 'ऑ', 'आ' और 'ओ' से भिन्न इनका मध्यवर्ती स्वर है।" (प्रयोजनमूलक हिंदी — संरचना एवं अनुप्रयोग : डॉ. रामप्रकाश, डॉ. दिनेश गुप्त)

यह देवनागरी लिपि की संपन्नता ही है जिसके कारण हिंदी में डॉक्टर, स्टॉप जैसे शब्दों को आज मान्यता मिल गई है। यहाँ यह कहना भी आवश्यक है कि देवनागरी लिपि में विदेशी ध्वनियों के लिप्यंतरण के लिए मध्यम मार्ग अपनाया गया है। इस संदर्भ में सन् 2003 में गठित समिति का यह कहना है:

"अंग्रेज़ी शब्दों का देवनागरी लिप्यंतरण इतना क्लिष्ट नहीं होना चाहिए कि उसके वर्तमान देवनागरी वर्णों में अनेक नए संकेत-चिह्न लगाने पड़ें।"

यह बात 'ऑ' के प्रयोग पर लागू नहीं होती है। आज अनेक लेखक हिंदी में डॉक्टर, ऑक्सीजन आदि शब्दों को प्रयोग करते हैं। मानक हिंदी से संबंधित नियमों को निर्धारित करने के लिए गठित समिति ने इसी तथ्य को स्वीकार करते हुए 'ऑ' के प्रयोग को मानक घोषित किया था। मैं भी हिंदी में स्टॉप, ऑक्सीजन जैसे शब्दों के प्रयोग को सही मानता हूँ।

हिंदी वर्तनी से संबंधित अनेक विषयों की तरह इस विषय पर भी वैयाकरणों और विद्वानों में मतैक्य नहीं है। कुछ वैयाकरण 'ऑ' के प्रयोग को व्याकरणसम्मत नहीं मानते हैं।

क्या आप भी 'स्टॉप' जैसे शब्द को मानक नहीं मानते हैं?







[Edited at 2009-03-29 13:15 GMT]


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